Monday, 9 August 2021

#प्रियंका मिश्रा ,जैसा सिर पर सवार वायरल- बुखार और चैतन्यता से भटकी नृत्य कला का एक और रूप -श्रेया कालरा !


चैतन्य महाप्रभु 



        यहां मैं आज नृत्य 💃की भारतीय कला को दोहराने जा रही हूं जिसकी हमारे समाज को बड़ी आवश्यकता है। यूं तो पिछले 5-6 सालों से समाज का टीवी और फ़िल्मी नृत्यों के प्रति रुझान बहुत बढ़ा है पर 2020 में कोरोना महाराज की घुसपैठ के बाद जैसे कुछ माता- पिता के पास अपने बच्चों को नृत्य सिखाने के अतिरिक्त कोई कला बची ही नहीं। हर कोई पलक झपकते ही सोशल नेटवर्क पर "वायरल " होना चाहता है। नृत्य कला क्या और क्यों सराही जाती है सब इसे पीछे छोड़ते हुए केवल हल्के या छिछले शब्दों और क्रियाओं वाले गानों का अनुसरण करना ही बुद्धिमता समझ रहे हैं। 

        नृत्य मानवीय अभिव्यक्तियों का एक रसमय प्रदर्शन है। यह एक सार्वभौम कला है, जिसका जन्म मानव जीवन के साथ हुआ है। बालक जन्म लेते ही रोकर अपने हाथ पैर मार कर अपनी भावाभिव्यक्ति करता है कि वह भूखा है- इन्हीं आंगिक -क्रियाओं से नृत्य की  उत्पत्ति हुई है। यह कला देवी-देवताओं- दैत्य दानवों- मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों को अति प्रिय है। भारतीय पुराणों में यह दुष्ट नाशक एवं ईश्वर प्राप्ति का साधन मानी गई है। अमृत मंथन के पश्चात जब दुष्ट राक्षसों को अमरत्व प्राप्त होने का संकट उत्पन्न हुआ तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अपने लास्य नृत्य के द्वारा ही तीनों लोकों को राक्षसों से मुक्ति दिलाई थी। इसी कड़ी में कई उदहारण हैं। 

              भारतीय संस्कृति एवं धर्म आरंभ से ही मुख्यत- नृत्यकला से जुड़े रहे हैं। पत्थर के समान कठोर व दृढ़ प्रतिज्ञ मानव हृदय को भी मोम सदृश पिघलाने की शक्ति इस कला में है। विश्वामित्र-मेनका का भी उदाहरण ऐसा ही है। यही इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है। जिसके कारण यह मनोरंजक तो है ही- धर्म- अर्थ- काम- मोक्ष का साधन भी है।

              अगर ऐसा नहीं होता तो यह कला-धारा पुराणों- श्रुतियों से होती हुई आज तक अपने शास्त्रीय स्वरूप में धरोहर के रूप में हम तक प्रवाहित न होती। इस कला को हिन्दू देवी-देवताओं का प्रिय माना गया है। भगवान शंकर तो नटराज कहलाए- उनका पंचकृत्य से संबंधित नृत्य सृष्टि की उत्पत्ति- स्थिति एवं संहार का प्रतीक भी है। भगवान विष्णु के अवतारों में सर्वश्रेष्ठ एवं परिपूर्ण कृष्ण नृत्यावतार ही हैं। इसी कारण वे 'नटवर' कृष्ण कहलाए। एक नृत्यशैली चैतन्य महाप्रभु की भी है। ईश्वर में स्वयं रमने और मानव के साथ पशुओं को भी रमाने की अद्भुत शक्ति थी महाप्रभु में । मीराबाई का संतों के साथ नृत्य-कीर्तन आदि।

                जिस तरह भारत में कोस-कोस पर पानी और वाणी बदलती है वैसे ही नृत्य शैलियाँ भी बदलती हैं। नृत्य का प्राचीनतम ग्रंथ भरत मुनि का नाट्यशास्त्र है। इसके उल्लेख वेदों में भी मिलते हैं, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाईयों में प्राप्त मूर्तियों के संबंध में पुरातत्वेत्ता नर्तकी होने का दावा करते हैं। ऋगवेद के अनेक श्लोकों में नृत्या शब्द का प्रयोग हुआ है। यर्जुवेद में भी नृत्य संबंधी सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। नृत्य को उस युग में व्यायाम के रूप में माना गया था। शरीर को अरोग्य रखने के लिये नृत्यकला का प्रयोग किया जाता था।

           आज भी कोई खुशी का कार्य नृत्य के बिना संपूर्ण नहीं होते। हाल ही में बॉलीवुड नृत्य की एक नई शैली अति लोकप्रिय हो चुकी है जो भारतीय सिनेमा पर आधारित है। कोरोनाकाल से सोशल साइड्स पर नृत्य कलाकारों की सुनामी सी आ गई है। हर कोई एक दिन में ही वश्वविख्यात होना चाहता  है जिसके लिए सस्ते और भद्दे किस्म के नृत्य पेश किए जा रहे हैं। हर पल एक नृत्य विडिओ अपलोड होते दिख जाएगा।

           अब नृत्यकला का उद्देश्य "येन -केन प्रकारेण " केवल खुद को मुख्यपृष्ठ पर लाने से ही है। टीवी पर नृत्य के अनगिनत कार्यक्रम आते हैं और वहां माता-पिता अपने नन्हे-मुन्नों को लेकर विश्वविजेता बनाने को निकल पड़ते हैं। अब वो ज़माने बीत गए जब दुल्हन लजाती -शर्माती जयमाल डालने आती थी। दुल्हन ने भी नृत्य करते हुए अंगप्रदर्शन की पूरी जिम्मेदारी उठा रखी है। अब मेनका-रम्भा सब  पृथ्वी पर ही उतर आईं हैं।नहीं तो शादी और अन्य ख़ुशी के अवसर पर ये अधिकार गरीबों को था जो आपके आयोजन की रौनक भी बढ़ाते थे और उन्हें बदले में चार पैसे भी मिल जाते थे।

              ये तो बहुत सामान्य बात है ! माँ ख्याति पाने के लिए अपने 10-12 साल के बच्चे के साथ कैसे भी विडिओ बनाने में हिचकती नहीं है।वर्दी में सरकारी पिस्तौल के साथ वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दिया। वायरल होने के इस बुखार ने 26 अगस्त 2021 को आगरा की महिला सिपाही प्रियंका मिश्रा को कहीं का नहीं छोड़ा। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग से परेशान प्रियंका को न सिर्फ मानसिक उत्पीड़न से गुजरना पड़ा है साथ ही उनकी नौकरी भी चली गई। खुद इनका ही विभाग इनकी सुरक्षा के लिए कुछ नहीं कर सका।पर सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो इस्तीफा स्वीकृत होना ठीक भी है ,इससे आगे कोई भी ऐसा करने से पहले थोड़ा तो सोचेगा।  

              आजकल एक वाक्य चलन में है कि-"हमें न सिखाओ हम सब जानते हैं" अब देख लीजिए कि आप कितना जानते और समझते हैं। देवगुरु वृहस्पति ने उन्हें इस पद पर पहुंचाया और जाने कहां से शनि ने उनको डुबा दिया ये महिला सिपाही ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। भाग्यवादी बनना अच्छा नहीं है पर किस्मत चार कदम आगे चलती है आप माने या न माने। तो तेज दौड़ने के साथ गिरने से भी बचते रहिए -नियति में कोई भेद-भाव नहीं है ,वो सबको नाप-तौल कर देती है।   

     

प्रियंका मिश्रा

      

         शरीर को अगर वायरल हो जाए तो उसे उतारने के लिए कम से कम 5-6 दिन तक प्रतिजैविक या एंटीबायोटिक लेते हैं। पर इस वायरल को बनाए रखने के लिए- तो लोग कुछ भी करने को तैयार हैं कुछ भी !

         इसी बुखार में सितम्बर को ही एक और नाम जुड़ा श्रेया कालरा का जो इंदौर से हैं इन्होंने बीच सड़क पर नृत्य करके प्रसिद्धि हासिल करना चाही। मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इनपर कानूनी कार्यवाही करने की मांग की और ट्रैफिक पुलिस ने इन पर केस दर्ज कर दिया। 

श्रेया कालरा 




           ये लेख किसी एक व्यक्ति या समाज  को इंगित नहीं करता बल्कि एक सोच को इंगित करता है।हमें समय-समय पर ये मंथन-मनन करते रहना चाहिए कि हम अपने बच्चों या समाज को क्या दे रहे हैं या क्या देना चाहिए क्योंकि जो देंगे उसको उसी रूप में प्राप्त होने से हमें कोई बचा नहीं सकता। जिसकी ताजातरीन परिणति महिला सिपाही को भुगतनी पड़ी। अपने किए के सबसे पहले जिम्मेदार आप स्वयं हैं।

          आपने इस लेख में वायरल होने के बुखार, एंटीबायोटिक का काम, चैतन्य महाप्रभु ,विश्वामित्र ,मेनका ,नटराज ,प्रियंका मिश्रा,श्रेया कालरा ख्याति पाने के लिए लालायित माँ विश्वविजेता बनने की अत्यधिक होड़ अदि के बारे में पढ़ा। 

धन्यवाद ! 

 जय हो "वायरल बाबा " की!!!!!!!!!

आज के नृत्य 



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Thursday, 5 August 2021

#अयोध्या-अजुध्या -बड़ी मासूम सी पितामही

🔔जब हमसे बड़े हमारे जीवन से चले जाते हैं तो उन पूर्वजों की हमें बहुत सी बातें याद रह ही जातीं हैं पर कुछ बातें ऐसी भी होतीं हैं जो हमने नहीं देखी पर सुनने में इतनी रोचक और रोमांचकारी होतीं है कि आज की सरपट दौड़ती जिंदगी में विराम लगाते कोरोना के डर से भी भूलती नहीं बल्कि कहीं ज्यादा सबल हो कर याद आतीं हैं। ऐसी ही कुछ हमारी दादी से जुड़ी हुई बातें हैं जो मुझे लिखने के लिए कभी से विवश कर रहीं थीं। लीजिए प्रस्तुत है दादीसंसार  


" चलो जाओ अब शाम को आना ! कहा ना अब नहीं है और रोटी इतनी ही थी सो तुम्हें देदी "

"पानी पीना हो तो बाहर जा कर पी लेना "

"अब शाम को और बनाएगी ब्याउली(बहू) फिर खाना आ कर, चलो जाओ! जाओ! ……जल्दी!!!! "

"और कहीं देखना अब ……"

ये संवाद हैं श्रीमती अयोध्यादेवी मिश्रा ,यानि कि हमारी दादी जो 100 वर्ष से ज्यादा उम्र गुजार कर परलोकवासी हुईं हैं।मुझे याद है ,वो अपना नाम अजुध्या बतातीं थीं , ये मैं आपलोगों पर छोड़ती हूँ कि आप अंदाजे लगाइये कि ये संवाद किससे कहे होंगे उन्होंने ?

मुझे ये याद नहीं कि उनके वाक्यों की भाषा -शैली कैसी थी ,हाँ उनके कुछ -कुछ शब्द अच्छे से याद हैं -
               जैसे जब वो किसी से ज्यादा दिन बाद मिलतीं या ऐसे ही पास रहने वाले अपने परिजनों पर प्यार उमड़ता तो -हासी बेटा,हासी बेटी जैसे शब्दों का प्रयोग पीठ पर हाथ से सहलाते हुए करतीं। जब उनको थोड़ा कम दिखाई देने लगा तो अपनों के चेहरे ,हाथ आदि की पूरी पड़ताल करतीं।कपड़ों की जांच-परख करतीं।जब घर का कोई छोटे आकर का सामान खो जाता तो वो कहतीं कि अमुक सामान में एक "बोलतापुस" होना चाहिए मतलब वो वस्तु स्वयं ही कह दे कि मैं यहां पड़ी हूँ मुझे उठा लो। ये शब्द उनका स्वयं का ही गढ़ा हुआ था।    
                  मैं उनके साथ ज्यादा नहीं रही हूँ ,हाँ एक बात बहुत अच्छे से याद है कि वो मेरे लिए बेला-चमेली से सफ़ेद कपड़े की गुड़िया बनाया करतीं थीं। उसके चेहरे पर ये काली-काली ऑंखें ,सुर्ख लाल धागे से उकेरे होंठ, सर पर मम्मी के पुराने चुटीले के बाल और पहनने को जरी की साड़ी। चौंकिए मत ये जरी या तो नई साड़ी से निकाला हुआ "कैंच" (कपड़े का वो हिस्सा जो कुछ आड़ा-टेड़ा होता हो )होता था या फिर जो साड़ी पुरानी हो जाती थी उसकी जरी होती थी। मम्मी बतातीं थीं कि उनकी शादी के समय भी हमारी दादी वैसी ही दिखतीं थीं जैसी हमलोगों ने देखीं मतलब हलके कद-काठी की एकदम गोरा रंग ,कम और मिश्री सी बोली। उतनी ही झुर्रियों वाला चेहरा जितना इस तस्वीर में दिख रहा है। इस सबका एक ठोस कारण ये बताया जाता है कि हमारे दादी- बाबा की बहुत समय तक कोई संतान जीवित नहीं रही  थी तो आगरा के पास से कासगंज पर कछला गंगा घाट है वहां तक बाबा ने पैदल चलकर 12 पूर्णिमा गंगा स्नान किया तब हमारे सबसे बड़े ताऊ जी बचे ( पहली संतान के रूप में )। ये आस्था और विश्वास वाली बात है।

गंगा का कछला घाट 




                वो अपने नाम को पूरी तरह चरितार्थ करतीं थीं। जैसे अयोध्या -जिसे युद्ध में न जीता जा सके। अर्थात वो युद्ध करना ही नहीं चाहती थी। जैसे अयोध्यावासी कभी युद्ध के पक्षधर नहीं रहे। उसी प्रकार वह दुनिया भर के सारे प्रपंचों से दूर रहतीं थी।नाजुक इतनी ज्यादा कि बैलगाड़ी में भी चक्कर आने लगते और उल्टियां हो जातीं थीं। कड़क और खरे वाक्य तो उनके स्वभाव में ही नहीं थे। यहां तक कि दरवाजे पर खड़े " कुत्ते " से वो कुत्ता नहीं कहतीं थीं। जब कभी उनके चारों बेटों में से कोई बेटा किसी बात पर असंतुष्टि जताते तो वो कहतीं कि " भागवान करे तुमलोगों के पास भी चार-चार बेटे हों "

          दादी की एक बहुत ही कमाल बात हमें सुनाई गई -जब वो शादी के दूसरी या तीसरी बार अपनी ससुराल आई। हमारा गांव रोड से लगभग तीन गांव के बाद 20-25 किमी की दूरी पर पड़ता होगा। उस समय दो गांव बाद कुछ एकदम बंजर स्थान पड़ता था। जहाँ "बेड़िया "लोगों का वर्चश्व था। एक जाति समुदाय है। जिसे  बेड़ियाजनजाति/समुदाय के नाम से जाना जाता है, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ इलाको में रहते हैं। जो मुख्यतः बुंदेलखंड प्रान्त के अंतर्गत आते है। बेड़िया जनजाति सर्वप्रथम बिहार झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के कुछ राज्यों में पाई गयी। माना जाता है कि ये समुदाय मोह्दिपहड़ में रहते थे तथा बेद्वंशी राजाओ के वंशज थे। ये लोग अपनी उत्पत्ति गंधर्वो से मानते है। इसी तरह से कई कहानियां इनके उत्पत्ति को लेकर विख्यात है। परन्तु वास्तविकता से अभी भी सभी अनभिज्ञ है। इस जनजाति को कई नामों से जाना जाता है, जैसे मांझी , शेरशाहबेड़िया, भाटिया, माल्दाहिया और बेड़िया। बेड़िया शब्द हिंदी भाषा के बाहाडा से लिया गया है। जिसका अर्थ है जंगल में रहने वाले लोग या जंगली निवासी ।


                2011 जनगणना के अनुसार इनको अनुसूचित जनजाति में नामित किया गया है। इनकी जनसँख्या 46775 है। यह एक  घुमक्कड जनजाति है, जिसको अपराधिक जनजाति अधिनियम के अंतर्गत अधिसूचित किया गया है।इनकी महिलाऐं "राई नृत्य "के लिए प्रसिद्द हैं। इसका नाम राई नृत्य इसलिए पड़ा क्योंकि पुराने समय में मशाल की रोशनी में ये किया जाता ,तो मशाल को जलते रहने के लिए उसमे बराबर "राई ( एक प्रकार की सरसों ) डाली जाती थी।

             तो बड़े ही नक्कासीदार घर हुआ करते थे इनके वहां। इनका जिकर मैंने अपने एक लेख " द्रोणनगरी" में भी किया है ,वही "हसीन दिलरुबा "वाला ज्वालापुर अभी भी आप यहाँ उत्तराखंड में भी इनके घर देख सकते हैं।

           तो ये तो हो गया "बेड़िया लोगों" का परिचय तो जब दादी अपनी ससुराल किसी अपने से बड़े के साथ आ रहीं थी और अकेली रहीं होंगी पीछे बैठने वालों में। उस समय जब बहू आती थी तो साथ में लगभग एक टाइम से ज्यादा का खाना मतलब पूड़ी और गुना लाती थी जिसे अपने  पहचान में बांटा भी जाता था। बांटने का एक उद्देश्य ये भी होता होगा, जिससे ये पता चल सके कि घर की बहू मायके से ससुराल आ गई। "पूड़ी पर गुना देना " एक मुहावरा भी है। गुना मीठे आटे की एक छल्लानुमा आकृति बनाई जाती है और फिर उसे तला जाता है। उत्तरप्रदेश में आज भी इसे बहू-बेटी के साथ देना शुभता की निशानी माना  जाता है 

               वो पूड़ियाँ एक टोकरी में होतीं थी और खूब सजे-धजे कपड़े से बंधी होती थी। रास्ते में इन्हीं बेड़ियों ने चलती बैलगाड़ी से धीरे-धीरे करके सारी पूड़ी और गुना (मीठे आटे की एक रिंग नुमा बना कर घी-तेल में पूरियों की तरह धीमी आंच पर तली जाती है ,ये शुभता का प्रतीक मानी जाती है आज भी )निकाल लिए और हमारी भोली दादी ने उन्हें चूं भी न किया। जब दादी घर पहुंची तो महिलाओं ने खाली टोकरी देखी ,आप खुद ही सोचिए क्या हुआ होगा ? तो साहब हमारी दादी ने बता दिया कि –

                               गुना





“वो सारी पूड़ियाँ तो बेड़ियों ने, कुछ खाई ,कुछ ले गए और खाली टोकरी छोड़ गए !!!!!!!!!! “आज तक सब हैरान हैं कि कोई कितना भोला हो सकता है ? पर वो थीं। तो मुझे मेरी अयोध्या सी दादी को बहुत-बहुत नमन ! 


             हमने इस लेख में बोलतापुस ,अयोध्या नगरी ,अयोध्या शब्द का अर्थ ,आस्था और विश्वास का उदहारण ,बेड़िया जाति उसका विख्यात नृत्य और घर बनाने की कारीगरी उनके कार्य आदि की चर्चा की आशा है आपके समय का अच्छा उपयोग हुआ होगा। 


                                                                                     

दादी


राई नृत्य 



लेखन तब तक सार्थक नहीं जब तक कि पढ़ने वाले उसपर प्रतिक्रिया ना दें। मुझे भी सदैव प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहती है। 




 

  शून्यता की ओर   मुझे लेखन क्षेत्र में आए हुए यही कोई १०-११ वर्ष हुए होंगे। पिछले ४-५ वर्ष से जब भी  मैं  किसी साहित्यिक आयोजन में होती...