Wednesday, 2 February 2022

संत वैलेंटाइन खुद उलझन में हैं!

 

संत वैलेंटाइन खुद उलझन में हैं!

हर साल 14 फरवरी को प्यार के दिन यानि कि वैलेंटाइन डे (Valentine's Day) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कपल्स एक दूसरे को गुलाब, चॉकलेट, तोहफें और कई सारी चीजें देकर प्यार का इजहार करते हैं। 

'ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन' किताब में वैलेंटाइन की चर्चा है। ये दिन रोम के एक संत जिनका नाम वैलेंटाइन था, उनके नाम पर पूरी दुनिया में मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि संत वैलेंटाइन पूरी दुनिया में प्यार को बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन रोम के राजा सम्राट क्लाउडियस को यह बात बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। सम्राट खुद शादीशुदा था,लेकिन वह सोचता था कि जो लोग प्रेम करते हैं और शादी करना चाहते हैं, वो अपनी पत्नी और परिवारों के साथ मजबूत लगाव होने की वजह से सेना में भर्ती नहीं हो रहे हैं। लोग ज्यादा संख्या में सेना में भर्ती हो सके, इसके लिए राजा क्लाउडियस ने रोम में शादी पर पाबंदी लगा दी। क्लाउडियस के इस आदेश से संत वैलेंटाइन ने विरोध किया। उनका कहना था कि प्रेम एक नैसर्गिक भावना है और किसी को इससे रोका नहीं जा सकता। इसके अलावा, वह शादी-विवाह पर पाबंदी के भी खिलाफ थे। उनका मानना था कि ऐसा करने से समाज का ढांचा चरमरा जाएगा। इसके विरोध में  संत वैलेंटाइन ने अधिकारियों और सैनिकों की शादी करवाई। संत के इस विरोध से नाराज होकर राजा क्लाउडियस ने उन्हें जेल में डाल दिया ,कहा जाता है कि,पादरी वैलेंटाइन ने जेल में रहते हुए जेलर की बेटी को खत में लिखा था "तुम्हारा वैलेंटाइन"। 14 फरवरी के दिन वैलेंटाइन को फांसी पर चढ़ा दिया। ऐसा कहा जाता है संत वैलेंटाइन को याद करने के लिए 14 फरवरी को 'प्यार के दिन' के तौर पर मनाया जाता है।

     इसे सेंट वेलेंटाइन फीस्ट भी कहा जाता है,सेंट वेलेंटाइन फीस्ट पोप गेलैसियस प्रथम की ओर से 496 ईस्वी में 14 फरवरी को एक कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया था। बाद में किंवदंती के साथ इसे प्रेम से जोड़ दिया गया। धीरे-धीरे यह एक ट्रेडिशन बन गया जिस पर कपल फूलों, उपहारों और ग्रीटिंग कार्ड के माध्यम से  एक-दूसरे  के लिए प्यार का इजहार करने लगे।

      वहीं भारत में इसका चलन 1992 के बाद बढ़ा। प्यार के जश्न का यह विशेष अवसर सप्ताह भर का उत्सव बन गया है जिसे वेलेंटाइन वीक कहा जाता है। यह वीक 7 फरवरी को रोज डे से शुरू होता है और 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे के साथ समाप्त होता है। वेलेंटाइन डे सेलिब्रेशन भारत में 1992 तक नहीं होता था। यह आर्थिक उदारीकरण के अलावा टीवी विज्ञापनों और रेडियो कार्यक्रमों के जरिए फैला।

      यह तो एक वजह है ही इस महीने में इस त्यौहार को मनाने की ,लेकिन भारत को ये रोग क्यों लगा इसके लिए कह सकते हैं कि इसी महीने में वसंत का आगमन होता है, जिसे ऋतुराज ,ऋतुपति,मधुपति ,मधुमास आदि भी कहा जाता है। इस ऋतु में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं और वातवरण में एक मादकता छा जाती है। यूं तो हर मौसम फूलों का होता है। ये तो अपने-अपने मन माने की है।इस मौसम में लोगों के दिल में प्यार की भावना स्वाभाविक तौर पर जगती है अर्थात ऐसा लगता है कि ये सिद्ध हो चुका है कि इन दिनों 'एंडोर्फिन,डोपामाइन,सेरोटोनिन और ऑक्सीटोसिन ये चार हार्मोन वातावरण में अत्यधिक मात्रा या कहा जाए कि ऑक्सीजन से ज्यादा होते हैं सो फरवरी के आते ही कुछ लोगों की जिंदगी की दशा और दिशा तय कर देते हैं। अब कितनों को  ऐसा लगता है ये तो जिनको लगता है वही जानें। हम तो यूं सबदिन प्रेममय ही रहते हैं जो न भी रहेंगे तो क्या कर लेंगे, सो प्रेम का भान बना रहना ही अच्छा है।

      साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक संस्था ‘शाश्वत की ओर से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में नाटक ‘रेगिस्तान में खरगोश’ का मंचन किया गया। सुरेन्द्र वर्मा लिखित व ऋतंधरा मिश्रा के निर्देशित नाटक में कलाकारों ने पारिवारिक विघटन और मानवीय संबंधों को प्रस्तुत किया। बदलते परिवेश में दाम्पत्य जीवन में आ रही विसंगतियों और तलाक के बाद बच्चों पर पड़ने वाले मानसिक प्रभाव को दिखाया गया।पति से अलग रह रही एक महिला और उसकी बेटी के बीच हुए मार्मिक संवाद दर्शकों को सोचने के लिए मजबूर करते रहे। एक महिला नए सिरे से जीवन शुरू करना चाहती है लेकिन उसकी बेटी और बेटी की नानी नए रिश्ते को स्वीकार नहीं करती।

    खरगोश को प्रेम या खुशी की निशानी माना जाता है। ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका में "खरगोश खरगोश खरगोश" ,कहा जाने वाला एक अंधविश्वास है जिसमें हर व्यक्ति एक महीने के पहले दिन जागने पर "खरगोश", "खरगोश" या "सफेद खरगोश" शब्दों को जोर से कहता या दोहराता है, जिससे आने वाले समय के लिए अच्छाई सुनिश्चित हो सके,सुख पर पूर्णाधिकार हो सके। अधिकांश ग्रीटिंग्स पर भी खरगोश की तस्वीरें इसी वजह से बनी होतीं हैं। एक मुहावरा भी है "फरवरी का खरगोश "।

वेलेंटाइन के नाम पर 

        कुछ रीजन्स में दूसरे क्षेत्रीय रीति-रिवाजों का भी पालन किया जाता है। उदाहरण के लिए नॉरफ़ॉक में एक करैक्टर जिसे 'जैक' वेलेंटाइन कहा जाता है, घरों के दरवाजों को नोक करता है और बच्चों के लिए मिठाई और गिफ्ट वहां पर छोड़ता है। स्लोवेनिया जैसी जगहों पर इस दिन अंगूर के बागों और खेतों में काम शुरू होता है।

       जो लोग वैंलेटाइन डे पर घर से निकलना चाहते हैं उन्हें,अंडमान-निकोबार द्वीप ,केरल के मुन्नार,जम्मू कश्मीर,सिक्किम के गंगटोक के बारे में लोग कम ही जानते हैं. गंगटोक कपल्स के लिए बेस्ट जगह मानी जाती है,फिलिपींस में वैलेंटाइन डे के मौके पर युवा जोड़े सरकार की तरफ से प्रायोजित कार्यक्रम में शादी करते हैं

    घाना- राष्ट्रीय चॉकलेट दिवस घाना में 14 फवरी को 'राष्ट्रीय चॉकलेट दिवस' के तौर पर मनाया जाता है. 2007 में देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने पहल की शुरुआत की थी.

     वैलेंटाइन डे डेनमार्क के नए त्योहारों में से एक है,यहां वैलेंटाइन डे गुलाब के फूल और चॉकलेट तक सीमित नहीं है। दोस्त और प्रेमी हाथ से तैयार कार्ड की अदलाबदली करते हैं, उस पर सफेद गुलाब का फूल होता है। जापान में पुरुषों को 14 मार्च तक बदले में गिफ्ट्स देने का समय होता है, जिसे 'सफेद दिवस' कहा जाता है।

लेकिन आज-कल का प्यार भी रफ-टफ हो चला है। जिस स्पीड से दो लोग एक-दूसरे के पास आते हैं, दोगुनी स्पीड से निकल भी लेते हैं। बस छोड़ जाते हैं एक सवाल कि प्यार क्या होता है, कैसे होता है? इस सब के बाद शुरू होते हैं 'प्यार के साइड इफेक्ट'वाले दिन। वैसे आप इन दिनों में भी पॉजिटिव रह सकते हैं जैसे-

फरवरी 15 – हैप्पी स्लैप डे- स्लैप डे पर अपनी बुरी आदतों को थप्पड़ मारकर अपनी लाइफ से भगाएं जो ऐसा न कर पाएं तो उससे थोड़ी कम बुरी आदत से काम चलाएं।  
फरवरी 16- हैप्पी किक डे किक डे पर अपने मन में आए नेगेटिव सोच को बाहर करें आसान नहीं है,पर कोशिश कर सकते हैं।
फरवरी 17- हैप्पी परफ्यूम डे – परफ्यूम डे पर अपनी जिंदगी को सकारात्मक गंध से महका दें नहीं तो एक गमले में ही सही जो फूल आपको पसंद हो लगा लें। 
फरवरी 18- हैप्पी फ्लर्टिंग डे–  फ्लर्टिंग डे पर नए दोस्त बनाएं और लाइफ को नए सिरे से जिएं क्योंकि सबसे सही विकल्प जीवन ही है।
फरवरी 19- हैप्पी कन्फेशन डे–  कन्फेशन डे पर अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश करें और खुद को हल्का महसूस करें।
फरवरी 20- हैप्पी मिसिंग डे– मिसिंग डे पर पार्टनर के साथ रही अच्छी यादों को याद करें साथ ही परिवार के अन्य सदियों को ख़ुशी देना सीखें। 
फरवरी 21- हैप्पी ब्रेकअप डे -नया साथी ढूंढिए मत खुद वा खुद मिलने का इंतजार करके देखिए।

  इस सबके साथ ही 'संस्कृति बचाओ मंच' ने अश्लीलता फैलाने पर लट्ठ पूजा की चेतावनी दी है, तो कांग्रेस गांधीगिरी से गुलाब का फूल देने की बात कर रही है।

 उनका कहना है कि जो लोग संस्कृति के खिलाफ अश्लीलता फैलाएंगे हम उनकी लट्ठ पूजा करेंगे। यही नहीं, संस्कृति बचाओ मंच (Sanskrit Bachao Manch) ने वैलेंटाइन डे पर फूहड़ता रोकने के लिए 22 अलग-अलग दस्‍ते तैयार किए हैं, जो कि पार्कों और रेस्टोरेंट में जाकर प्रेमी जोड़ो को संस्कृति का पाठ पढ़ाएंगे। कांग्रेस कहना है कि हम प्रेमी जोड़ों को गांधीगिरी से गुलाब का फूल देंगे और उनकी सुरक्षा भी करेंगे, क्‍योंकि महात्‍मा गांधी ने कहा था कि अहिंसा परमो धर्म।

वेलेंटाइन के नाम पर 


      भोपाल पुलिस ने पूरे शहर में होर्डिंग्स के जरिये यह संदेश दिया है कि सरेराह कोई मनचला युवतियों पर कमेंट्स करता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा अलग-अलग होर्डिंग्स में छेड़छाड़ का विरोध करने वाले कार्टून बनाकर मनचलों पर कार्रवाई के संकेत दिए हैं। वहीं, भोपाल पुलिस का कहना है कि कोई भी व्यक्ति अगर छात्राओं या युवतियों के साथ छेड़छाड़ करता है, तो पुलिस एक्शन लेकर उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगी। ये तो एक-दो उदहारण हैं

      वैलेंटाइन-डे को लेकर डिजिटल ठग ब्रांडेड कंपनियों के नाम से मुफ्त और डिस्काउंट का ऑफर लिए बैठे हैं। ऐसे में अगर आपके मोबाइल या ई-मेल पर ऑफर और कूपन आ रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। लुभावने ऑफर के चक्कर में फंसकर आप जेब ना लुटा बैठें। लॉकडाउन के बाद डिजिटल फ्रॉड के बढ़ते ट्रेंड में यह नया तरीका जनवरी के आखिरी हफ्ते से शुरू हुआ है। महानगरों के अलावा गांवों के लोग भी इसका शिकार बने हैं। शिकायतें बढ़ीं, तो साइबर सेल ही नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय के साइबर सेंटर ने भी लोगों को इस नए ट्रेंड से सतर्क रहने को कहा है। सेंटर ने इस बात को लेकर भी चेताया है कि ऐसे लिंक आपके मोबाइल, लैपटॉप में मालवेयर भी इंस्टॉल कर सकते हैं।सभी का अपना-अपना धंधा है।

बाकी आपाधापी वाली दुनिया में प्यार करने और मुँह फेरने के ढेरों तरीके और कारण हैं जिसे जो सही लगे !

   मैं किसी वैलेंटाइन डे की पैरवी नहीं करती ,न ही मेरे मना करने से कोई मानेगा। जो भी करो सोच-विचार कर करो तो हालात सम्हालने लायक रहते हैं नहीं तो ,जय राम जी की !

पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया देंगे तो मैं समझ पाऊँगी कि मैंने क्या -कैसा लिखा है। धन्यवाद !

Sunday, 23 January 2022

सैनेटाइजर और ग्रीक अक्षर की सांठ गांठ

हमारा गांव आगरा के पास मुख्य मार्ग से कोई 10-15 किमी होगा। तब हमलोग घर तक  का रास्ता बैलगाड़ी आदि से तय करते थे ,कहीं-कहीं तो बैलगाड़ी के पलटने के डर से कुछ दूर तक उतर कर पैदल भी चलना पड़ता था। तो कितने भी बचो पैर धूल-मिट्टी में हो ही जाते थे। पर गांव पहुंच कर लगता मानो किसी देश की राजकुमारी हूं मैं। ज्यादा याद नहीं पर एक बात नहीं भूलती कि वहां पहुंच कर सीधे ही हम कमरों में नहीं जाते थे। कमरों के बाहर बरामदा होता था ,वहां चारपाई पड़ीं होतीं थीं उनपर बैठते थे फिर कुछ ही देर में एक महिला आतीं थीं जिनको हमारी भाषा में 'नाइन' बोलते हैं वो एक थाली या ऐसे ही किसी वर्तन में पानी लातीं और उसमें मम्मी और मेरे पैर रखतीं और उनको कुछ देर धोती फिर निकालतीं ,बदले में मम्मी उनको रूपए या ऐसा ही कुछ सामान देतीं ,कभी वो नहीं आ पातीं तो मम्मी से रिश्ते में छोटी कोई भी महिला ये काम करतीं उसके बाद,खुद हाथ-मुंह धोकर कपड़े बदल कर आगे की दिनचर्या शुरू होती। ये सब अकेले हमारे गांव में ही नहीं होता था और भी बहुत सी जगह होता आ रहा है ,बस अंदाज अलग-अलग हैं। जिसका एक उदहारण गुरूद्वारे हैं ,जहां मौसम के अनुसार ठंडा-गरम वहता पानी गुरूद्वारे में प्रवेश से पहले ही होता है जिसमें पैर रखकर ही अंदर जाना होता है। 

         इससे पैरों की सफाई के साथ सफर की थकान भी कम होती है और उस सब से जरूरी काम ये होता है कि सारी अला-बला दूर भाग जातीं हैं। क्या ? अला-बला नहीं जानते ? अरे ! भाई वही आपकी 'नकारात्मक ऊर्जा' जो दिखाई नहीं देती पर होती है अब तो सब मान ही गए हैं क्योंकि धीरे-धीरे ये मुआ कोरोना तीन साल का हुआ जा रहा है।

         अब ज्यादातर लोगों ने सफर के बाद की साफ-सफाई या सामन्य रूप में बाहर से आने के बाद घर में घुसने से पहले कोई नियम कायदा -कानून मानने बंद कर दिए हैं। मंहगे-मंहगे कपड़े कोई रोज थोड़े धोए जाते हैं 5-10 हजार के जूते घर के बाहर थोड़े उतारे जाएंगे। महानगरों में तो बाहर जैसी कोई जगह मिलती भी नहीं है। इसी सब का नतीजा अब महामारी बनकर सामने आया और 'वो थाली का पानी ' सैनेटाइजर के रूप में सामने आया। कमाल का तालमेल है सैनेटाइजर और ग्रीक अक्षरों में। क्या ?दिमाग पर जोर डालना पड़ रहा है चलिए आसानी कर देती हूं - कोरोना काल के डेल्टा और ओमीक्रॉन वैरिएंट ग्रीक अक्षर ही हैं।

       तो जब बस साफ-सफाई की हो तो साबुन से हाथ धोना सबसे अच्‍छा माना जाता है लेकिन अगर साबुन और पानी की व्‍यवस्‍था नहीं है तो हैंड सैनेटाइजर सबसे बढ़िया विकल्‍प है। कोरोना काल में तो हैंड सैनिटाइजर एक अस्‍त्र की तरह काम आ रहा है और इसे हर वक्‍त अपने साथ रखना लोगों की जरूरत बन गई है।

      हमने सबसे पहले जी टीवी के धारावाहिक 'हिटलर दीदी' में देखा वो एक-इकलौता,मेरा पसंदीदा सीरियल है अभी भी 2012 -13  में आने वाले इस सीरियल को डाउनलोड करने के लिए हम रात को दो-ढाई बजे उठ के लगा देते और बाद में आराम से देखते। उसके बाद तो सामान्य सा लगाने लगा ये सैनेटाइजर शब्द। पर इतना जरूरी तो ये कोरोना के आक्रमण से ही हुआ कि हर किसी के जरूरी सामान में ये भी पाया ही जाएगा।

ल्यूप हर्नान्डिज


            एक रिपोर्ट के अनुसार सबसे पहले इसे बनाने का आइडिया साल 1966 में अमेरिकी राज्य कैलिफोर्निया के बेकर्सफील्ड शहर में रहने वाली एक लड़की को आया , जिसका नाम ल्यूप हर्नान्डिज था ,ल्यूप नर्सिंग की एक छात्रा थीं। एक दिन अचानक उनके दिमाग में आया कि किसी मरीज के पास जाने से पहले या उसके पास से आने के बाद हाथ साफ करने के लिए साबुन और पानी न हो तो क्या होगा। इसके बाद उन्होंने सोचा कि क्यों न कुछ ऐसा बनाया जाए, जो साबुन से कुछ अलग हो और बिना पानी के भी काम चल जाए, साथ ही उसके इस्तेमाल से कीटाणु भी मर जाएं। ऐसे में उन्होंने एक अल्कोहल युक्त जेल बनाया और उसे अपने हाथों पर रगड़ कर यह चेक किया कि उससे क्या फायदा होता है।ल्यूप का अल्कोहल युक्त जेल काम कर गया। उससे कीटाणुओं का भी सफाया हो गया और पानी की तरह उसे सुखाने की भी जरूरत नहीं पड़ी।

सैनेटाइजर


          इस तरह ल्यूप का यह 'आविष्कार' धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल गया और बड़ी संख्या में इसका इस्तेमाल होने लगा। ल्यूप हर्नान्डिज का जन्म 16 सितम्बर 1952 में हुआ इनकी वर्तमान आयु 69  वर्ष है। आज ल्यूप के बारे बहुत कम ही लोग जानते हैं लेकिन उनका ये 'आविष्कार' पूरी दुनिया को फायदा जरूर पहुंचा रहा है। लोगों ने इन्हे खूब धन्यवाद दिया है इनके इस कार्य के लिए। ये किसी अजूबा से कम नहीं कि जब इन्होंने इसका अविष्कार किया है तब इनकी आयु मात्रा 14  साल रही होगी जो ऐसे कार्यों  के लिए बहुत कम है। लेकिन इसी को कहेंगे 'बेटी के पांव।'

अल्कोहल-आधारित हैंड सैनेटाइजर का उपयोग सामान्यतः यूरोप में यही कोई 1980 के दशक से किया गया है। अल्कोहल-आधारित संस्करण विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं की सूची में है, जो स्वास्थ्य प्रणाली में आवश्यक सबसे सुरक्षित और प्रभावी दवाएं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सुझाए गए सूत्र
पहला सूत्र-
घटक  आवश्यक आयतन (10 लीटर बनाने के लिए) सक्रिय घटक % (v/v)
एथनॉल 96%  8333 mL        80%
ग्लीसरॉल 98%           145 mL          1.45%
हाइड्रोजन परॉक्साइड 3%    417 mL          0.125%
आसुत  जल    added to 10000 mL            18.425%

दूसरा सूत्र -

घटक  आवश्यक आयतन (10 लीटर बनाने के लिए)         सक्रिय घटक % (v/v)

आइसोप्रोपिल अल्कोहल 99.8%     7515 mL        75.15%

ग्लीसरॉल 98%           145 mL          1.45%

हाइड्रोजन परॉक्साइड 3%    417 mL          0.125%

आसुत  जल    added to 10000 mL            23.425%

      महामारी कोई पहली बार नहीं आई है ,100 साल पहले भी ताऊन या प्लेग (Plague) संसार की सबसे पुरानी महामारियों में है। इसे ताऊन, ब्लैक डेथ, पेस्ट आदि नाम भी दिए गए हैं। मुख्य रूप से यह कृतंक (rodent) प्राणियों (प्राय: चूहे) का रोग है, जो पास्चुरेला पेस्टिस नामक जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता है। प्राचीन काल में किसी भी महामारी को प्लेग कहते थे। यह रोग कितना पुराना है इसका अंदाज इससे किया जा सकता है कि एफीरस के रूफुस ने, जो ट्रॉजन युग का चिकित्सक था, "प्लेग के ब्यूबों" का जिक्र किया है और लिखा है कि है। ईसा पूर्व युग में 41 महामारियों के अभिलेख मिलते हैं। ईसा के समय से सन् 1500 तक 109 बड़ी महामारियाँ हुईं, जिनमें 14वीं शताब्दी की "ब्लैक डेथ" प्रसिद्ध है।

       अब सामान्य तौर पर घरों में चूहे नहीं होते हैं। ये बात और है कि कहीं-कहीं इन्ही चूहों को एअरपोर्ट पर सामान की जांच-पड़ताल के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। 2018  में महाराष्ट्र में चूहे घोटाले को लेकर केंद्र और राज्य में बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने तंज कसा है। कहने का मतलब 'चूहे' राजनीति में भी शामिल हैं इनको हल्के में मत लीजिए।

          उस समय के लोगों पर आज के बुद्धिजीवी 'जागरूकता की कमी ' का आरोप लगाते हैं पर अब तो सब जरूरत से ज्यादा जागरूक हैं फिर भी ये महामारी कैसे और क्यों आ कर हावी हो गई ? इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो।

      तो मैं बात कर रही थी साफ-सफाई या शुद्धता की। जब हम छोटे थे तो मम्मी ने कभी भी हमें दर्जी के वहां से सिल के आए कपड़े बिना धोए हुए नहीं पहनने दिए। पहनने से पहले उनको कुछ देर पानी में भिगो कर फिर धो कर सुखाया जाता और अगले दिन पहनने के लिए प्रेस करके मिलते थे। अब रेडीमेट या ऑनलाइन आते हैं उनको कौन-कैसे-कब पहनता है कोई नहीं जानता। आपने भी महसूस किया होगा कभी जब आप किसी कपड़े की दुकान पर जाते हों तो वहां कपड़ों से कैमिकल की गंध इतनी तेज आती है कि छींक भी आ जाती है या जरा भी सहन नहीं होती ,कभी-कभी तो जुखाम भी हो जाता है। दर्जी जब कपड़े सिलते हैं तो कपड़े जमीन पर भी गिरते हैं और उनका दिनभर का वही काम है तो वो कैसे हाथों से इनको बना रहे हैं, इसी सब से बचने के लिए उनके हिसाब से धोना जरूरी था। यहां मैं 'संस्कारों' की पोटली नहीं खोलूंगी वरना लेख आध्यात्म की ओर चला जाएगा और आध्यात्म अब लोगों को कम रास आता है।

      मम्मी ने एक और बात सिखाई ,किसी अनजान को या मांगने आने वाले को पानी आदि उसके वर्तन में देने के बाद शेष पानी को वापस घर में नहीं लाते। जब आप किसी के वर्तन में तरल पलटते हैं तो उसके वर्तन और आपके वर्तन की धार एक होती है तो अगर उसमें कैसे भी विषाणु होंगे वो आपको स्वतः मिल जाएंगे। बहुत से लोग बोतल या ग्लास से पानी 'आ' करके पीते हैं और बताते हैं कि-झूठा नहीं किया है आ करके पिया है। वो भी सही नहीं है ,अच्छा है आप ग्लास से सीधा पिएं जूठा करके। हमारे वहां मंगलवार को 'कुष्ठरोगी' आते हैं हमारे यहां से पैसों के साथ दूध-मट्ठा भी लेते हैं तो हम अंदाज से निकालते हैं और यदि बचता है तो उन्हीं को ज्यादा दे देते हैं या फिर हमारी धरतीमाता तो है ही सब ग्रहण करने वाली। ये नियम सभी चीजों में लागू होता है जिसके लिए जो निकाल दिया वो जहां तक बन पड़े वापस खुद के लिए नहीं रखते।

       ये तो कुछ उदहारण हैं हमारे देश की संस्कृति के। अब तो घरों में सालों हवन नहीं होते धूप नहीं जलती कि घर काला हो जायेगा दीवारों के मंहगे पेंट खराब हो जाएंगे। हमारी भाभियों ने जब बच्चों को जन्म दिया तो पूरे 10 -11 दिन उनके कमरे के बाहर ,लोबान (लोहबान-Frankincense जिसे ओलिबैनम भी कहा जाता है और ये बोसवेलिया पेड़ के राल से बनाया जाता है)-गंधक([Ne] 3s2 3p4) में राई वगैरह मिलाकर धुआं किया जाता था। जिससे किसी भी तरह का संक्रमण अंदर ना जा सके।अब बच्चे पैदा होते ही पीलियाग्रसित हो जाते हैं जबकि जन्म देने वाली माँ अत्यधिक जानकार और डॉक्टर- डाइटीशियन के सुझाए डाइट-प्लान पर चलतीं हैं। करिए कुछ भी बस करने से पहले जैसी जरूरत लगे सोचिए-समझिए-परखिए फिर कीजिए।

इस ब्लॉग में आपने सैनेटाइजर के साथ ही गांव के लोगों की जागरूकता ,हिटलर, आगरा,लोबान-गंधक,प्लेग के अलग-अलग नाम ,चूहा ,पीलिया आदि के बारे में पढ़ा।

अपना खयाल रखिए ! जयहिंद

प्रतिक्रिया अवश्य करें।

  

  शून्यता की ओर   मुझे लेखन क्षेत्र में आए हुए यही कोई १०-११ वर्ष हुए होंगे। पिछले ४-५ वर्ष से जब भी  मैं  किसी साहित्यिक आयोजन में होती...